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Generation17 के युवा लीडर्स से मिलिए: सौम्या डबरीवाल की कहानी

07-09-2026

सौम्या डाबरीवाल ‘जेनरेशन17’ की सदस्य हैं। यह सैमसंग और यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (UNDP) की एक पार्टनरशिप है, जो ‘ग्लोबल गोल्स’ (वैश्विक लक्ष्यों) में योगदान देने वाले युवाओं को सशक्त बनाती है।

2020 से, इस पहल ने दुनिया भर के युवा लीडर्स को सैमसंग गैलेक्सी टेक्नोलॉजी, मेंटरशिप और नेटवर्किंग के मौके दिए हैं, ताकि वे अपनी कहानियों और समाधानों को और लोगों तक पहुँचा सकें।

जब सौम्या डाबरीवाल 21 साल की थीं और भारत और घाना के गांवों में मैथ टीचर के तौर पर वॉलंटियरिंग कर रही थीं, तब उन्होंने एक ऐसी बात देखी जिसे वे समझ नहीं पा रही थीं। लड़कों की तुलना में लड़कियाँ क्लास से ज़्यादा गैर-हाज़िर रहती थीं — यहाँ तक कि एक ही घर के भाई-बहनों में भी ऐसा होता था; भाई तो स्कूल आता था, लेकिन बहन घर पर ही रहती थी।

जब सौम्या ने पूछा, तो किसी ने इसका कारण नहीं बताया। उन्हें असलियत तब पता चली जब स्टूडेंट्स ने उन्हें गर्मी में पानी न पीने की सलाह दी, क्योंकि स्कूल में टॉयलेट नहीं थे। जल्द ही यह बात साफ़ हो गई: बुनियादी सुविधाओं के बिना, लड़कियों के पास पीरियड्स के दौरान स्कूल न जाने के अलावा कोई चारा नहीं था।

उन्होंने इस पर रिसर्च शुरू की और पाया कि दुनिया भर में लड़कियों के पास स्कूल में बने रहने और अपने सपने पूरे करने के लिए ज़रूरी हेल्थ एजुकेशन, सपोर्ट और रिसोर्स की कमी थी। सौम्या कहती हैं, “मैं बहुत परेशान और निराश थी। यह बात गलत लगती थी कि बायोलॉजी की वजह से लड़कियां अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल नहीं कर पा रही थीं।” “किसी और के कदम उठाने का इंतज़ार करने के बजाय, मैंने इस समस्या को हल करने की ठान ली।”

टेक्नोलॉजी पर आधारित, महिलाओं के नेतृत्व में

2017 में, उन्होंने ‘प्रोजेक्ट बाला’ (जिसका हिंदी में मतलब है ‘छोटी लड़की’) की शुरुआत की। यह एक सोशल एंटरप्राइज़ है जो नए और अनोखे तरीकों से पीरियड्स के दौरान साफ़-सफ़ाई और रिप्रोडक्टिव हेल्थ (प्रजनन स्वास्थ्य) तक पहुँच की समस्या को हल करता है। इसका मकसद अच्छी शिक्षा (गोल 4), अच्छी सेहत और भलाई (गोल 3), जेंडर इक्वालिटी या लैंगिक समानता (गोल 5), और अच्छे काम और आर्थिक विकास (गोल 8) के लिए UN के ग्लोबल लक्ष्यों को आगे बढ़ाना है।

Community workshops are at the heart of Baala's approach, combining education with open conversations that help break long-standing taboos.
▲ बाला (Baala) के काम करने के तरीके में कम्युनिटी वर्कशॉप अहम हैं। इनमें शिक्षा के साथ-साथ खुलकर बातचीत भी की जाती है, जिससे लंबे समय से चली आ रही वर्जनाओं को तोड़ने में मदद मिलती है।

सौम्या ने ऐसी वर्कशॉप्स शुरू कीं जिनमें लड़कियां अपने शरीर और सेहत के बारे में सीखती थीं। लेकिन सिर्फ़ शिक्षा ही काफ़ी नहीं थी। किफ़ायती और लंबे समय तक चलने वाले फ़ेमिनिन हाइजीन प्रोडक्ट्स न मिल पाने के कारण लड़कियां अब भी स्कूल नहीं जा पाती थीं। जब बाज़ार में उनकी ज़रूरतों को पूरा करने वाला कोई प्रोडक्ट नहीं मिला, तो सौम्या ने घर पर मौजूद चीज़ों का इस्तेमाल करके एक प्रोटोटाइप बनाया। इस तरह एक साधारण से विचार को एक ऐसे समाधान में बदल दिया जो आज लाखों लड़कियों तक पहुँच रहा है।

इसके बाद, उन्होंने और उनकी बढ़ती टीम ने स्थानीय महिलाओं को हेल्थ एजुकेशन और फ़ेमिनिन हाइजीन प्रोडक्ट्स पहुँचाने की ट्रेनिंग देना शुरू किया। ‘बाला बॉसेस’ (Baala Bosses) के नाम से जानी जाने वाली ये महिलाएँ पैसे भी कमाती हैं—अक्सर अपनी ज़िंदगी में पहली बार—और साथ ही अपने परिवार की मदद करने के साथ-साथ कम्युनिटी लीडर के तौर पर अपना आत्मविश्वास भी बढ़ाती हैं।

बाला (Baala) के विकास में टेक्नोलॉजी ने अहम भूमिका निभाई है। सोशल मीडिया इस संस्था को दुनिया भर की महिलाओं और लड़कियों से जोड़ता है, जबकि ऑनलाइन ट्रेनिंग की वजह से बाला बॉसेस कहीं भी रहकर सीख सकती हैं और जानकारी साझा कर सकती हैं। डिजिटल फ़ील्ड डेटा टीम को अपने असर को मापने और अपने प्रोग्राम्स को लगातार बेहतर बनाने में मदद करता है। सौम्या कहती हैं, “टेक्नोलॉजी ने हमें बड़े स्तर पर काम करने और उन लोगों तक पहुँचने में सचमुच मदद की है, जिन तक हम शायद कभी नहीं पहुँच पाते।”

पिछले आठ सालों में, बाला ने 4,500 से ज़्यादा बाला बॉसेस को ट्रेनिंग दी है, 18 लाख महिलाओं और लड़कियों तक पहुँची है, महिलाओं की सेहत से जुड़ी झिझक या शर्म को दूर करने के लिए 10,000 से ज़्यादा पुरुषों को शामिल किया है, और ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले संगठनों के साथ 260 से ज़्यादा साझेदारियों के ज़रिए 51 लाख दोबारा इस्तेमाल होने वाले पीरियड प्रोडक्ट्स बांटे हैं।

Soumya and the Baala team meet at their Delhi office to review insights from the field and plan future initiatives.
▲ सौम्या और बाला टीम क्षेत्र से प्राप्त जानकारी की समीक्षा करने और भविष्य की पहल की योजना बनाने के लिए अपने दिल्ली कार्यालय में मिलते हैं।

महिलाओं की सेहत के लिए एक आंदोलन खड़ा करना

‘बाला’ (Baala) को खड़ा करना आसान नहीं था। सौम्या को हर स्तर पर मुश्किलों का सामना करना पड़ा—लोगों को यह यकीन दिलाने से लेकर कि एक युवा महिला फाउंडर को गंभीरता से लिया जाए, और लंबे समय से चली आ रही सामाजिक वर्जनाओं (taboos) का सामना करने तक। इन अनुभवों ने उनके इस विश्वास को और पक्का किया कि स्थायी बदलाव समुदायों के भीतर से ही आना चाहिए।

आज, ‘बाला बॉसेस’ (Baala Bosses) अपने-अपने इलाकों में परिवारों को जागरूक करके, दूसरों के लिए मौके बनाकर और अगली पीढ़ी को प्रेरित करके बदलाव ला रही हैं। सौम्या कहती हैं, “जो महिलाएं कभी अपना चेहरा ढंककर रखती थीं, वे अब खुलेआम अपने बाल लहराते हुए चलती हैं और इस विषय पर खुलकर बात करती हैं।” “कुछ महिलाएं कम्युनिटी लीडर बनती हैं। कुछ एंटरप्रेन्योर बनती हैं। कुछ हेल्थ मोबिलाइज़र बनती हैं। तो कुछ टीचर बनती हैं।”

Participants gather for a photo following one of Baala's community workshops in northern India.
▲ उत्तरी भारत में बाला (Baala) के कम्युनिटी वर्कशॉप में से एक के बाद प्रतिभागी फ़ोटो के लिए इकट्ठा हुए।

महिलाओं की सेहत, अधिकारों और मौकों को बढ़ावा देना

30 साल की सौम्या का सपना है कि वह ‘बाला’ (Baala) के असर को और बढ़ाती रहें। उन्हें उम्मीद है कि 2030 तक वे प्रोडक्ट में नए बदलाव, बेहतर शिक्षा और टेक्नोलॉजी-आधारित समाधानों के ज़रिए दुनिया भर की 1 करोड़ महिलाओं और लड़कियों तक पहुँच पाएँगी।

इस सोच को हकीकत में बदलने के लिए, उनकी टीम ने ‘बाला एक्शन लैब’ शुरू किया। यह एक ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म है जो दुनिया भर में महिलाओं की सेहत को बेहतर बनाने के लिए यूनिवर्सिटीज़ के साथ मिलकर काम करता है। यह पहल महिलाओं की सेहत से जुड़ी बेहतर पॉलिसी और निवेश के लिए एकेडमिक रिसर्च और असल दुनिया के सबूतों को एक साथ लाती है।

सौम्या का कहना है कि कामयाबी का असली पैमाना वह दिन होगा जब ‘बाला’ की ज़रूरत ही न रहे — यानी जब महिलाओं और लड़कियों के पास खुद आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी जानकारी, मौके और सपोर्ट हो।

तब तक, वह लगातार अपना काम करती रहती हैं।

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